मुंगेर के ऐतिहासिक बरगद की उम्र वैज्ञानिक जांच में करीब 700 वर्ष निकली, अब इसे विरासत वृक्ष घोषित करने की तैयारी
बिहार: बिहार में एक विशाल बरगद का पेड़, जिसने सदियों से लोगों को छाया दी है, अब पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। मुंगेर में स्थित इस बरगद के पेड़ के बारे में वैज्ञानिक जाँच से पता चला है कि यह लगभग 700 साल पुराना है। यह दुनिया का सबसे पुराना, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित जीवित बरगद का पेड़ बन गया है।
यह खोज केवल वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में एक उपलब्धि ही नहीं है; इसे बिहार की सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक परंपराओं और प्राकृतिक धरोहर के लिए गर्व का स्रोत भी माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह पेड़ भारत के इतिहास, पर्यावरण और आध्यात्मिक परंपराओं का एक जीवंत प्रतीक है।
वैज्ञानिकों ने कैसे पता लगाई पेड़ की उम्र?
इस ऐतिहासिक खोज को अंजाम दिया लखनऊ स्थित बिरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (Birbal Sahni Institute of Palaeosciences) के वैज्ञानिकों ने। शोधकर्ताओं ने पेड़ के विभिन्न हिस्सों से नमूने लेकर रेडियोकार्बन (C-14) डेटिंग तकनीक का इस्तेमाल किया।
अध्ययन के अनुसार, इस बरगद के पेड़ की शुरुआत 14वीं शताब्दी के आसपास या उससे भी पहले की मानी जा रही है। इसका मतलब है कि यह वृक्ष दिल्ली सल्तनत के अंतिम दौर, कई राजवंशों के उत्थान-पतन, औपनिवेशिक काल और आधुनिक भारत के निर्माण का साक्षी रहा है।
शोध दल का नेतृत्व वैज्ञानिक डॉ. त्रिना बोस ने किया और अध्ययन के निष्कर्ष 2026 में अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका Quaternary Research में प्रकाशित किए गए।
दूर से दिखता है एक छोटे जंगल जैसा
यह वृक्ष भारतीय बरगद यानी Ficus benghalensis प्रजाति का है, जिसे आमतौर पर वटवृक्ष या बरगद कहा जाता है।
बरगद की सबसे अनोखी विशेषता इसकी लटकती जड़ें हैं, जो समय के साथ जमीन में पहुंचकर नए तनों का रूप ले लेती हैं। इसी वजह से एक ही वृक्ष कई सौ वर्षों तक जीवित रह सकता है।
मुंगेर का यह बरगद इतना विशाल है कि दूर से देखने पर यह किसी छोटे जंगल जैसा प्रतीत होता है। इसकी फैली हुई छाया, असंख्य तने और जड़ों का जाल इसे प्रकृति का जीवंत स्मारक बनाते हैं।
धर्म और आस्था में क्यों खास है वटवृक्ष?
भारतीय संस्कृति में वटवृक्ष को केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि दीर्घायु, स्थिरता और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में वटवृक्ष का विशेष महत्व बताया गया है। वट सावित्री व्रत से लेकर अनेक धार्मिक अनुष्ठानों में इसकी पूजा की जाती है। मान्यता है कि वटवृक्ष जीवन, संरक्षण और अनंतता का प्रतीक है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, यह बरगद सदियों से संतों, यात्रियों, ग्रामीणों और शासकों के विश्राम और संवाद का केंद्र रहा है। कई पीढ़ियां इसकी छांव में बीत चुकी हैं, जिससे यह वृक्ष क्षेत्र की सांस्कृतिक स्मृतियों का भी हिस्सा बन गया है।
पुराने रिकॉर्ड को पीछे छोड़ गया बिहार
इससे पहले उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में स्थित सिद्धवारी बरगद को सबसे पुराने वैज्ञानिक रूप से दिनांकित बरगदों में गिना जाता था, जिसकी उम्र लगभग 400 से 500 वर्ष आंकी गई थी।
मुंगेर का बरगद इस रिकॉर्ड से काफी आगे निकल गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया भर में कई पेड़ों को हजारों साल पुराना बताया जाता है, लेकिन उनमें से अधिकांश दावे लोककथाओं या परंपरागत मान्यताओं पर आधारित होते हैं। मुंगेर का यह बरगद उन दुर्लभ वृक्षों में शामिल है जिनकी आयु आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से प्रमाणित की गई है।
विरासत वृक्ष घोषित करने की तैयारी
इस ऐतिहासिक खोज के बाद बिहार वन विभाग द्वारा इस बरगद को “हेरिटेज ट्री” यानी विरासत वृक्ष घोषित करने की प्रक्रिया शुरू किए जाने की जानकारी सामने आई है।
यदि इसे यह दर्जा मिलता है, तो वृक्ष को विशेष कानूनी संरक्षण मिलेगा और इसके संरक्षण एवं देखभाल के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराए जा सकेंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम आने वाली पीढ़ियों के लिए इस प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण साबित होगा।
जलवायु संकट के दौर में उम्मीद का प्रतीक
आज जब जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और अनियोजित शहरीकरण के कारण दुनिया भर में पुराने वृक्षों का अस्तित्व खतरे में है, तब मुंगेर का यह 700 वर्षीय बरगद प्रकृति की अद्भुत सहनशक्ति और जीवटता का उदाहरण बनकर सामने आया है।
यह वृक्ष केवल बिहार या भारत की पहचान नहीं है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि यदि प्राकृतिक धरोहरों का संरक्षण किया जाए तो वे सदियों तक मानव सभ्यता के साथ खड़ी रह सकती हैं।
जब दुनिया जलवायु संकट, प्रदूषण और तेजी से हो रहे शहरी विस्तार की चुनौतियों का सामना कर रही है, तब मुंगेर का यह 700 वर्षीय बरगद प्रकृति की अद्भुत सहनशक्ति और जीवटता का प्रतीक बनकर सामने आया है।
सात सदियों से खड़ा यह वटवृक्ष हमें याद दिलाता है कि प्रकृति के कुछ खजाने केवल देखने की चीज नहीं, बल्कि हमारी पहचान, संस्कृति और भविष्य का हिस्सा हैं।
आज यह बरगद केवल बिहार की शान नहीं, बल्कि भारत की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत का एक जीवित स्मारक बन चुका है।