उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में स्थित गोलू देवता मंदिर न्याय और आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। चितई स्थित इस प्रसिद्ध मंदिर में श्रद्धालु स्टाम्प पेपर और चिट्ठियों के माध्यम से अपनी शिकायतें और मनोकामनाएँ प्रस्तुत करते हैं।
नई दिल्ली: ऐसे देवता, जिनको लोग स्टाम्प पेपर पर अपनी शिकायत लिखकर अर्जी लगाते हैं। अर्जी पूरी होने के बाद यहाँ मंदिर में घंटियाँ चढ़ाते हैं। उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में गोलू देवता मंदिर “न्याय के देवता” के नाम से प्रसिद्ध मंदिर है, जहाँ लोग दूर-दूर से आते हैं और अपनी समस्या को एक स्टाम्प पेपर के जरिए शिकायत या अपनी मनोकामनाएँ पूरी होने की अर्जी के रूप में लगाते हैं। अल्मोड़ा जिले में स्थित चितई में यह मंदिर है, जिसका कुमाऊँनी संस्कृति और वहाँ के लोगों में बहुत महत्व है, जिससे वे आज भी जुड़े हुए हैं।
गोलू देवता की मान्यताएँ और इतिहास
गोलू देवता के बारे में कहा जाता है कि वे भगवान शिव और गौर भैरव के अवतार हैं। लोककथाओं के अनुसार गोलू कत्यूरी वंश के राजा झाल राय और रानी कालिंका के पुत्र थे। हालांकि, इसके ठोस ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलते हैं। कुछ लोग उन्हें चंद राजवंश के समय का सेनापति मानते हैं, जिन्होंने लोगों के लिए न्याय करने का कार्य किया।
गोलू देवता की जन्मकथा को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में कई और भी कहानियाँ सुनने को मिलती हैं। लेकिन उत्तराखंड में गोलू देवता को लोग आज भी न्याय और सत्य का प्रतीक मानते हैं।
लोककथा और अनोखी परंपरा
एक प्रसिद्ध लोककथा के अनुसार गोलू देवता का जन्म एक ऐसी रानी के पुत्र के रूप में हुआ, जिन्हें महल से निकाल दिया गया था। जंगल में जन्मे बच्चे को गोरिल या गोलू कहा गया। लोककथाओं के अनुसार बड़े होकर उन्होंने अपनी माँ को न्याय दिलाया और समाज में गरीबों की मदद के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।
इसी वजह से लोग उन्हें न्याय का देवता कहने लगे। गोलू देवता मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा वहाँ लोगों द्वारा लगाई जाने वाली अर्जियाँ हैं। लोग चिट्ठी या स्टाम्प पेपर पर लिखकर मंदिर में टाँग देते हैं। जिनकी मनोकामनाएँ पूरी हो जाती हैं, वे वहाँ धन्यवाद के रूप में मंदिर में घंटी चढ़ाते हैं। मंदिर परिसर में हजारों-लाखों घंटियाँ दिखाई देती हैं।
गोलू देवता के प्रमुख मंदिर
अल्मोड़ा जिले के चितई में स्थित गोलू देवता मंदिर के अलावा भी कई प्रसिद्ध स्थान हैं, जैसे घोड़ाखाल मंदिर, जो नैनीताल जिले में स्थित है; ग्वाला देवता मंदिर, जो चंपावत में है, जिसे उनकी जन्मस्थली से भी जोड़ा जाता है; और गैराड़, जो बिनसर क्षेत्र में स्थित है। ये मंदिर उत्तराखंड की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। तकनीक और आधुनिकता के दौर में भी लोगों की गोलू देवता में आस्था कम नहीं हुई है। आज भी देश-विदेश से लोग पत्र भेजकर अपनी प्रार्थनाएँ मंदिर तक पहुँचाते हैं।