120 Bahadur रिव्यू: फरहान अख्तर की वापसी फीकी, 120 सैनिकों की शौर्य गाथा पर्दे पर उतनी प्रभावी नहीं

120 Bahadur रिव्यू: फरहान अख्तर की वापसी फीकी, 120 सैनिकों की शौर्य गाथा पर्दे पर उतनी प्रभावी नहीं

1962 के भारत-चीन युद्ध पर बनी ‘120 Bahadur’ दमदार विषय के बावजूद कमजोर screenplay, सीमित भावनात्मक जुड़ाव और साधारण निर्देशन के कारण अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पाती।

नई दिल्ली, 20 नवंबर 2025

1962 के भारत-चीन युद्ध की सच्ची घटना पर आधारित फरहान अख्तर की फिल्म ‘120 Bahadur’ 21 नवंबर को रिलीज होने जा रही है। फिल्म रेज़ांग ला पोस्ट पर तैनात 120 भारतीय सैनिकों की ऐतिहासिक वीरता को बड़े पर्दे पर लाती है। विषय गम्भीर और प्रेरणादायक है, लेकिन फिल्में केवल कहानी के दम पर नहीं चलतीं—और यही बात इस फिल्म को पीछे छोड़ देती है। दमदार प्लॉट के बावजूद कमजोर screenplay और सीमित भावनात्मक गहराई फिल्म को अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंचने देती।

कहानी

एक्सेल एंटरटेनमेंट और ट्रिगर हैप्पी स्टूडियोज के बैनर तले बनी यह फिल्म मेजर शैतान सिंह भाटी (फरहान अख्तर) और उनके 120 जवानों की कहानी दिखाती है, जिन्होंने रेज़ांग ला पोस्ट पर 3000 चीनी सैनिकों के सामने अंतिम सांस तक मोर्चा संभाले रखा।
कड़कड़ाती ठंड, सीमित संसाधन और लगातार बढ़ते खतरे—इन परिस्थितियों में भी भारतीय सैनिकों की यह जंग अपने आप में अद्वितीय है।

हालांकि कहानी बेहद मजबूत है, लेकिन कई दृश्य उतने भावनात्मक नहीं बन पाते, जितना इस विषय की मांग थी। कई संवाद प्रभाव छोड़ने में चूक जाते हैं, और देशभक्ति का उभार भी सीमित महसूस होता है।

अभिनय

चार साल बाद बड़े पर्दे पर लौट रहे फरहान अख्तर इस बार उम्मीदों पर पूरी तरह खरे नहीं उतरते। मेजर शैतान सिंह जैसे सशक्त किरदार की गहराई उनके परफॉर्मेंस में पूरी तरह दिखाई नहीं देती।
राशि खन्ना थोड़ी देर के लिए स्क्रीन पर नजर आती हैं और ठीक प्रदर्शन करती हैं, लेकिन उनकी और फरहान की केमिस्ट्री दर्शकों को बांध नहीं पाती।
विवान भतेना और एजाज खान अपनी-अपनी भूमिकाओं में बेहतर साबित होते हैं। सपोर्टिंग कास्ट ने वातावरण को असलियत देने की कोशिश की है, लेकिन प्रभाव सीमित रहता है।

निर्देशन

निर्देशक रजनीश ‘रेजी’ घोष फिल्म को बड़े स्केल पर दिखाने की कोशिश करते हैं और कुछ दृश्य वाकई असर छोड़ते हैं। लेकिन कुल मिलाकर निर्देशन में निरंतरता की कमी दिखती है। कई जगह भावनाओं को स्वाभाविक रूप से उभरने देने के बजाय उन्हें समझाया गया है, जिससे प्रभाव कम हो जाता है। फिल्म कई पलों में ‘बॉर्डर’ जैसी झलक देती है, मगर उस स्तर तक पहुंच नहीं पाती।

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स्क्रीनप्ले और एडिटिंग

स्क्रीनप्ले कभी तेज चलता है तो कभी बहुत धीमा पड़ जाता है। कई किरदारों की बैकस्टोरी अचानक सामने लाने से कहानी का प्रवाह टूटता है।
एडिटिंग भी कई जगह जल्दबाज़ी का शिकार लगती है, जिससे कुछ सिन भावनात्मक प्रभाव नहीं छोड़ पाते।

एक्शन, VFX और तकनीकी पहलू

कुछ एक्शन सीक्वेंस अच्छे बन पड़े हैं और तनाव का अहसास कराते हैं। लेकिन कई जगह VFX कृत्रिम लगते हैं और साफ पता चलता है कि कुछ लोकेशन सेट पर शूट की गई हैं। युद्ध का असली भय और मैदान का माहौल पूरे समय महसूस नहीं होता।

संगीत

फिल्म का संगीत औसत है। न गाने याद रहते हैं न बैकग्राउंड स्कोर कोई खास छाप छोड़ता है। युद्ध आधारित फिल्म में संगीत का प्रभाव बेहद जरूरी होता है, लेकिन यहां वह कमी साफ नजर आती है।

क्या अच्छी बातें हैं?

  • रेज़ांग ला पोस्ट के वाइड शॉट्स और लोकेशन इफेक्टिव दिखते हैं।
  • सैनिकों की एकजुटता और जिम्मेदारी दर्शाने वाले कुछ दृश्य दिल छू जाते हैं।
  • कम-ज्ञात वीरगाथा को बड़े पर्दे पर लाने का प्रयास सराहनीय है।

देखें या नहीं?

‘120 Bahadur’ अपने विषय, इतिहास और शहीद सैनिकों के प्रति सम्मान के कारण एक बार देखी जा सकती है। खासकर उन दर्शकों के लिए जो 1962 के युद्ध और रेज़ांग ला की कहानी करीब से समझना चाहते हैं।
लेकिन यदि आप एक बेहद भावनात्मक, तीव्र और यादगार युद्ध फिल्म की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह फिल्म आपको अधूरा अनुभव दे सकती है।

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