"भारत में शतरंज को जनांदोलन बनाने वाले एल.एन. झुंझुनूवाला से मिले राजस्थान के युवा सितारे"

“भारत में शतरंज को जनांदोलन बनाने वाले एल.एन. झुंझुनूवाला से मिले राजस्थान के युवा सितारे”

नई दिल्ली | भारत में शतरंज पुनर्जागरण के प्रेरक और दूरदर्शी उद्योगपति श्री एल.एन. झुंझुनूवाला से मुलाकात कर राजस्थान के युवा फीडे रेटेड शतरंज खिलाड़ियों—आलोकिक माहेश्वरी, आराध्या उपाध्याय और हार्दिक शाह—ने गहरी प्रेरणा प्राप्त की। इन युवा खिलाड़ियों के साथ उनके कोच श्री प्रकाश पाराशर भी मौजूद थे। यह विशेष भेंट 9 जून को नई दिल्ली स्थित श्री झुंझुनूवाला के आवास पर हुई, जब ये खिलाड़ी दिल्ली के छतरपुर स्थित टिवोली गार्डन्स में आयोजित ओपन ग्रैंडमास्टर्स टूर्नामेंट में हिस्सा लेने के बाद वहाँ पहुँचे।

ये तीनों विद्यार्थी विवेकानंद केंद्र विद्यालय, हुरड़ा (राजस्थान) के छात्र हैं—जो श्री झुंझुनूवाला द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और समग्र विकास को बढ़ावा देने के लिए स्थापित चार विद्यालयों में से एक है। इस भेंट ने न केवल इन खिलाड़ियों की उपलब्धियों को सराहा, बल्कि श्री झुंझुनूवाला के वर्षों से भारतीय शतरंज में दिए योगदान को भी रेखांकित किया।

श्री झुंझुनूवाला ने शतरंज को केवल एक खेल नहीं, बल्कि मानसिक विकास, अनुशासन और रणनीतिक सोच का माध्यम माना। उनकी सोच ने शतरंज को शिक्षा और संस्कृति के बीच सेतु बनाते हुए समाज के विविध वर्गों तक पहुँचाया।

भारत में शतरंज के ढांचे को सुदृढ़ करने हेतु उन्होंने 1973 में ‘नेशनल चेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ की स्थापना की, और 1982 में भारत का पहला ग्रैंडमास्टर्स टूर्नामेंट आयोजित कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की पहचान मजबूत की। उन्होंने स्कूल शिक्षा में शतरंज को शामिल करने की पैरवी की और ‘बॉटविनिक चेस अकादमी’ की स्थापना की, जहाँ विश्वनाथन आनंद और अभिजीत गुप्ता जैसे दिग्गज खिलाड़ियों को प्रशिक्षण मिला।

श्री झुंझुनूवाला ने न सिर्फ शतरंज, बल्कि कराटे, योग, तीरंदाजी, निशानेबाजी और एथलेटिक्स जैसे अन्य खेलों को भी बढ़ावा दिया, जिससे छात्रों का समग्र शारीरिक और मानसिक विकास सुनिश्चित हो सके। उनकी सोच शिक्षा और खेलों के बीच एक संतुलित तालमेल का आदर्श प्रस्तुत करती है।

उन्होंने देश की पहली शतरंज पत्रिका “चेस इंडिया” का प्रकाशन शुरू किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग को भी बढ़ावा दिया। उनके सतत प्रयासों ने क्रिकेट केंद्रित भारत में शतरंज को लोकप्रिय बनाया और यह विश्वास मजबूत किया कि भारतीय खिलाड़ी भी विश्व मंच पर शानदार प्रदर्शन कर सकते हैं। आज की सफलताओं की नींव कहीं न कहीं उनकी इस दूरदृष्टि में ही छिपी है।

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