IRIS DENA डूबा, IRIS LAVAN बचा: भारत ने मानवता की मिसाल पेश करते हुए ईरान के 183 नौसैनिकों को दी शरण

IRIS DENA डूबा, IRIS LAVAN बचा: भारत ने मानवता की मिसाल पेश करते हुए ईरान के 183 नौसैनिकों को दी शरण

अमेरिकी नौसेना द्वारा ईरानी युद्धपोत IRIS DENA को डुबाए जाने के बाद भारत ने मानवीय आधार पर ईरान के दूसरे युद्धपोत IRIS LAVAN को कोच्चि बंदरगाह में शरण देकर 183 नौसैनिकों की जान बचाई। जानें इस पूरे घटनाक्रम की सारी रिपोर्ट।

नई दिल्ली: हिंद महासागर में उस वक्त एक बड़ा संकट खड़ा हो गया जब अमेरिकी नौसेना ने 4 मार्च 2026 को ईरान के युद्धपोत IRIS DENA को अपनी परमाणु पनडुब्बी से टॉरपीडो दागकर श्रीलंकाई जलसीमा के पास डुबो दिया। इस हमले में करीब 180 नौसैनिक सवार थे, जिनमें से अधिकांश की जान चली गई। लेकिन इसी संकट की घड़ी में भारत ने एक अहम मानवीय भूमिका निभाई — उसने ईरान के दूसरे युद्धपोत IRIS LAVAN को अपने कोच्चि बंदरगाह में शरण देकर 183 नौसैनिकों की जान बचा ली।

IRIS DENA पर हमला: ऑपरेशन एपिक फ्यूरी का हिस्सा

अमेरिका इन दिनों ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के तहत सैन्य अभियान चला रहा है। इसी अभियान के अंतर्गत 4 मार्च 2026 को अमेरिकी परमाणु पनडुब्बी ने ईरानी नौसेना के माउज-क्लास फ्रिगेट IRIS DENA को निशाना बनाया। घटना के समय यह युद्धपोत भारत के मुंबई में आयोजित हुए इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में शामिल होकर वापस ईरान लौट रहा था।

इस हमले में जहाज पर सवार करीब 180 लोगों में से 87 के शव श्रीलंका नेवी ने बरामद किए और 32 घायलों को सुरक्षित निकाला। बाकी लापता नौसैनिकों की तलाश में भारतीय नौसेना और श्रीलंका नेवी संयुक्त सर्च ऑपरेशन चला रही हैं। यह हमला अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक बड़े झटके के रूप में सामने आया, क्योंकि ईरानी युद्धपोत एक सौहार्दपूर्ण अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक कार्यक्रम से लौट रहा था।

भारत से अनुरोध और IRIS LAVAN की कोच्चि में डॉकिंग

ईरानी नौसेना को पहले से ही आशंका थी कि युद्धाभ्यास से लौटते समय उसके जहाजों पर हमला हो सकता है। इसलिए ईरान ने पहले से ही भारत से संपर्क कर लिया था। 28 फरवरी 2026 को भारत को एक औपचारिक अनुरोध प्राप्त हुआ जिसमें बताया गया कि IRIS LAVAN में तकनीकी खराबी आ गई है और उसे तत्काल कोच्चि बंदरगाह पर डॉकिंग की जरूरत है।

भारत सरकार ने 1 मार्च 2026 को इस अनुरोध को मंजूरी दे दी। इसके बाद IRIS LAVAN 4 मार्च को कोच्चि पहुंचा और वहां सुरक्षित रूप से डॉक हो गया। जहाज पर सवार 183 क्रू मेंबर फिलहाल कोच्चि में भारतीय नौसेना के आवासीय परिसर में सुरक्षित ठहराए गए हैं। गौरतलब है कि IRIS LAVAN कोई युद्धक जहाज नहीं है — यह ईरानी नौसेना का एम्फिबियस जहाज है जो मुख्यतः ट्रेनिंग और गुडविल विजिट के लिए इस्तेमाल होता है।

मिलन युद्धाभ्यास और दोनों जहाजों का भारत दौरा

IRIS DENA और IRIS LAVAN दोनों ही भारत में आयोजित हुए अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए भारत आए थे। IRIS LAVAN मुंबई में हुए इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में 25 से 28 फरवरी 2026 तक शामिल रहा। इसी दौरान ईरान ने भारत से जहाज को कोच्चि में रोकने की अनुमति मांगी। इस कार्यक्रम में कई देशों के नौसैनिक जहाज शामिल हुए थे और ईरान का इसमें भाग लेना एक सामान्य कूटनीतिक पहल का हिस्सा था।

भारत का रुख: निष्पक्षता और मानवता के बीच संतुलन

भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि IRIS LAVAN को कोच्चि में डॉकिंग की अनुमति देना एक शुद्ध मानवीय और तकनीकी आधार पर लिया गया निर्णय है। इस युद्ध में भारत किसी भी पक्ष — न अमेरिका और न ही ईरान — का समर्थन नहीं करता। भारत ने सभी पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है।

यह निर्णय भारत की उस परंपरागत विदेश नीति के अनुरूप है जिसमें वह रणनीतिक स्वत्व अधिकार बनाए रखते हुए मानवीय संकटों में अग्रणी भूमिका निभाता है। ऐसे में 183 नौसैनिकों को संभावित खतरे से बचाना भारत की उसी सोच का परिणाम है।

संकट में भारत की जिम्मेदार भूमिका

IRIS DENA की त्रासदी और IRIS LAVAN की सुरक्षित वापसी की यह घटना एक साथ कई सवाल और सबक लेकर आती है। एक तरफ जहां अंतरराष्ट्रीय जलसीमाओं में बढ़ता सैन्य तनाव खतरनाक स्तर पर पहुंच रहा है, वहीं भारत ने यह साबित किया है कि मानवता और कूटनीति के बीच संतुलन बनाए रखना संभव है। 183 नौसैनिकों की जान बचाकर भारत ने न केवल एक मानवीय दायित्व निभाया, बल्कि यह भी दिखाया कि वह हिंद महासागर क्षेत्र में एक जिम्मेदार और भरोसेमंद साझेदार है।

आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि अमेरिका-ईरान संघर्ष किस दिशा में जाता है और भारत इस भू-राजनीतिक उठापटक में अपनी निष्पक्षता को कैसे बनाए रखता है।

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