कमानी ऑडिटोरियम में शास्त्रीय नृत्य का जादू — राजनाथ सिंह ने सराहा शांभवी शर्मा की प्रतिभा और सामाजिक पहल ‘नृत्यामृत’

कमानी ऑडिटोरियम में शास्त्रीय नृत्य का जादू — राजनाथ सिंह ने सराहा शांभवी शर्मा की प्रतिभा और सामाजिक पहल ‘नृत्यामृत’

कुचिपुड़ी नृत्य के माध्यम से सामाजिक सेवा की अनूठी पहल ‘नृत्यामृत’ को मिली राष्ट्रीय पहचान

नई दिल्ली: कमानी ऑडिटोरियम में सोमवार की शाम कला और समर्पण की मिसाल बनी, जब युवा कुचिपुड़ी नृत्यांगना शांभवी शर्मा ने अपने प्रथम एकल मंचन में दर्शकों को भावविभोर कर दिया। कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ‘नृत्यामृत’ रिपोर्ट का विमोचन करते हुए उनके कार्य की सराहना की।

शांभवी शर्मा, संस्कृति स्कूल, नई दिल्ली की कक्षा 12 की छात्रा और सांस्कृतिक परिषद की अध्यक्ष हैं। वे पिछले एक दशक से पद्म भूषण गुरु राजा और राधा रेड्डी के सान्निध्य में नाट्य तरंगिणी संस्थान से प्रशिक्षण प्राप्त कर रही हैं। शांभवी ने अपने अब तक के नृत्य सफर में कई प्रतिष्ठित मंचों पर प्रदर्शन किया है, जिनमें अंतरराष्ट्रीय राजगीर महोत्सव (2022), G20 यूथ कनेक्ट प्रोग्राम (2023) और परंपरा सीरीज़ शामिल हैं।

कमानी ऑडिटोरियम में शास्त्रीय नृत्य का जादू — राजनाथ सिंह ने सराहा शांभवी शर्मा की प्रतिभा और सामाजिक पहल ‘नृत्यामृत’

शांभवी न केवल एक नृत्यांगना हैं बल्कि वे एक लेखिका भी हैं। उनके ‘द एल्गोरिदम ऑफ बेताल’ लेख को नेशनल बुक ट्रस्ट (एनबीटी) द्वारा जून 2025 में प्रकाशित किया गया था, जिसमें उन्होंने भारतीय पौराणिक कथाओं के माध्यम से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की नैतिकता पर रोचक विमर्श प्रस्तुत किया है।

अपने रंगप्रवेशम में शांभवी ने चार पारंपरिक कुचिपुड़ी प्रस्तुतियाँ दीं — दशावतार, गणनाथाय, तरंगम और सांसों की माला, जिनमें भक्ति, तकनीकी निपुणता और भावाभिव्यक्ति का सुंदर संगम देखने को मिला।

‘नृत्यामृत’, जिसे 2023 में शुरू किया गया था, शांभवी की सामाजिक पहल है। इसके माध्यम से वे कुचिपुड़ी नृत्य को उपचार के साधन के रूप में अस्पतालों, वृद्धाश्रमों और वंचित समुदायों तक पहुंचा रही हैं। इस पहल के अंतर्गत बच्चों के लिए नृत्य चिकित्सा सत्र और डांस क्लासेस आयोजित की जाती हैं।

अपने सफर को याद करते हुए शांभवी ने कहा , “ जब मैं छह साल की उम्र में नाट्य तरंगिणी से जुड़ी थी, तब यह एक शांत शुरुआत थी, जो धीरे-धीरे एक सुंदर यात्रा में बदल गई। नृत्य मेरे लिए एक ऐसी शांति का माध्यम है जहाँ संगीत और लय में मेरी सारी चिंताएँ खो जाती हैं।”

यह संध्या शांभवी शर्मा की दशक भर की साधना और समर्पण का प्रतीक रही, साथ ही नाट्य तरंगिणी की उस परंपरा को भी आगे बढ़ाने वाली बनी, जो भारत की अगली पीढ़ी के शास्त्रीय कलाकारों को तैयार करने में निरंतर योगदान दे रही है।

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