दिल्ली: अजी कृष्णन ने केंद्र सरकार से अपील की कि विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) के संशोधित प्रावधानों को बिना किसी देरी के पूरे देश में लागू किया जाए।
उन्होंने कहा कि विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) भारत में विदेशी देशों एवं संस्थाओं से प्राप्त होने वाले आर्थिक सहयोग (विदेशी अंशदान) को विनियमित करने के लिए बनाया गया कानून है। इस कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन का उपयोग देश की राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता तथा जनहित के विरुद्ध न हो।
अजी कृष्णन ने कहा कि एफसीआरए संशोधन विधेयक का कुछ ईसाई चर्च नेताओं द्वारा किया जा रहा विरोध पूरी तरह प्रेरित और दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने आरोप लगाया कि 15वीं शताब्दी से पुर्तगालियों के नेतृत्व में विदेशी ईसाई प्रभाव भारत में बढ़ा और विदेशी शक्तियों ने भारत के संसाधनों तथा संपत्ति का व्यापक दोहन किया। उन्होंने यह भी दावा किया कि अनेक हिंदू मंदिरों को नष्ट किया गया तथा कोच्चि और गोवा जैसे क्षेत्रों में औपनिवेशिक शक्तियों ने अपने प्रभुत्व स्थापित किए।
उन्होंने कहा कि मिशनरी भारत में धर्मांतरण के उद्देश्य से आए थे और उन्होंने भारतीय संस्कृति, परंपरा एवं विरासत को पश्चिमी धार्मिक मान्यताओं से बदलने का प्रयास किया। उनके अनुसार, पोप द्वारा नियुक्त बिशप वेटिकन के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं और भारत में चर्च के नियमों को लागू करते हैं।
अजी कृष्णन ने आरोप लगाया कि पूर्वोत्तर भारत के ईसाई बहुल राज्यों, जैसे मणिपुर, नागालैंड, मिजोरम और मेघालय में लंबे समय से अशांति का वातावरण रहा है तथा विदेशी सहायता का उपयोग राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए किया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ क्षेत्रों में चर्च संगठनों ने उग्रवादी समूहों के साथ सहयोग किया तथा विदेशी वित्तपोषित ईसाई प्रचार गतिविधियों का विस्तार हुआ।
उन्होंने कहा कि जबरन एवं धोखे से कराए जाने वाले धर्मांतरण भारत की एकता और सामाजिक समरसता के लिए गंभीर खतरा हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ लोग धर्म की स्वतंत्रता को संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार बताते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने का अधिकार देता है, लेकिन किसी प्रकार का दबाव, प्रलोभन या छलपूर्वक कराया गया धर्मांतरण संविधान की भावना के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने कहा कि देश के कई राज्यों ने जबरन धर्मांतरण को रोकने के लिए धर्मांतरण विरोधी कानून बनाए हैं और सर्वोच्च न्यायालय भी जबरन धर्मांतरण को स्वीकार्य नहीं मान चुका है। उन्होंने आरोप लगाया कि चर्च द्वारा संचालित कुछ शैक्षणिक संस्थान, अस्पताल और सेवा संस्थाएं धर्मांतरण के केंद्र के रूप में कार्य कर रही हैं तथा व्यापक मीडिया नेटवर्क का उपयोग धार्मिक प्रचार के लिए किया जा रहा है।
अजी कृष्णन ने कहा कि देश में सक्रिय तथाकथित “कन्वर्ज़न माफिया” पर कठोर नियंत्रण स्थापित करना आवश्यक है ताकि सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुरक्षित रखा जा सके।
उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक रूप से धर्मांतरण चर्च की गतिविधियों का प्रमुख उद्देश्य रहा है और दुनिया भर में मिशनरी गतिविधियों का अंतिम लक्ष्य धर्मांतरण ही रहा है। उनके अनुसार, धर्मांतरण की विचारधारा इस मान्यता पर आधारित है कि केवल एक ही धर्म या विचारधारा सही है।
उन्होंने आरोप लगाया कि मिशनरियों ने पहले स्थानीय धार्मिक परंपराओं एवं आस्थाओं को कमजोर करने का प्रयास किया और उसके बाद ईसाई धर्म का प्रचार किया। उनके अनुसार, यही रणनीति भारत सहित अनेक देशों में यूरोपीय औपनिवेशिक विस्तार का आधार बनी।
पूर्वोत्तर भारत का उल्लेख करते हुए उन्होंने दावा किया कि कुछ ईसाई बहुल सीमावर्ती राज्यों में अलगाववादी आंदोलनों को मिशनरी गतिविधियों और विदेशी प्रभाव से समर्थन मिला। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ क्षेत्रों में चर्चों ने हिंदुओं और बौद्धों के विरुद्ध अभियान चलाए तथा विदेशी वित्तपोषित संगठनों ने उग्रवादी समूहों का समर्थन किया।
अजी कृष्णन ने कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना के विरुद्ध चर्च द्वारा संचालित आंदोलनों की भी आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय आयोजनों के बहिष्कार के लिए भी लोगों को प्रेरित करने के प्रयास किए गए।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद देश की रियासतों और राजपरिवारों ने अपनी संपत्तियां भारतीय गणराज्य को समर्पित कर दीं, लेकिन कुछ धार्मिक संस्थानों, विशेषकर ईसाई चर्चों और मुस्लिम संगठनों के पास आज भी व्यापक भूमि संपत्ति मौजूद है।
उन्होंने स्वयं को विदेशी सत्ता के प्रतिनिधि बताने वाले बिशपों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि एफसीआरए नियमों का विरोध विदेशी धन के दुरुपयोग और अवैध गतिविधियों को छिपाने के उद्देश्य से किया जा रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ धार्मिक नेताओं ने वर्षों से प्राप्त विदेशी धन के माध्यम से चर्च, संस्थान और निजी संपत्तियां खड़ी की हैं। उन्होंने कहा कि धार्मिक एवं सेवा कार्यों के लिए मिलने वाला विदेशी धन किसी भी स्थिति में राष्ट्रहित के विरुद्ध उपयोग नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत में कार्यरत प्रत्येक संस्था भारतीय कानूनों का पालन करने के लिए बाध्य है तथा विधिसम्मत रूप से कार्य करने वाले अधिकांश गैर-सरकारी संगठन सरकार के रुख का समर्थन करते हैं। उन्होंने एफसीआरए के अंतर्गत प्राप्त धन के उपयोग में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि समाजसेवा के लिए प्राप्त धन का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।
अजी कृष्णन ने कहा कि—
- विदेशी धन के माध्यम से किसी भी प्रकार की राष्ट्रविरोधी गतिविधियों की संभावना को पूरी तरह समाप्त किया जाना चाहिए।
- धर्मांतरण के लिए विदेशी धन के दुरुपयोग के आरोपों की निष्पक्ष जांच कर आवश्यक नियमन किया जाना चाहिए।
- भारत के आंतरिक मामलों में किसी भी प्रकार के विदेशी हस्तक्षेप को रोकना सरकार की जिम्मेदारी है।
- सभी गैर-सरकारी संगठनों को विदेशी धन के स्रोत और उसके व्यय का पूर्ण एवं पारदर्शी विवरण सार्वजनिक करना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है तथा विदेशी मूल के धर्म, विशेषकर ईसाई और इस्लाम, देश को लाभ पहुंचाने के बजाय सामाजिक तनाव का कारण बने हैं।
अपने वक्तव्य के अंत में अजी कृष्णन ने कहा कि वर्तमान केंद्र सरकार धर्मांतरण लॉबी के दबाव में आने वाली सरकार नहीं है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा लाए गए एफसीआरए संशोधनों का पूर्ण समर्थन करते हुए कहा कि ये प्रावधान राष्ट्रीय हित, भारत की सुरक्षा और देश की प्रगति के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।