नई दिल्ली: जून 2026 की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकिंग प्रणाली की स्थिति, वैश्विक वित्तीय जोखिमों और आर्थिक स्थिरता से जुड़े विभिन्न पहलुओं की समीक्षा की है। रिपोर्ट में क्रिप्टो परिसंपत्तियों, विशेष रूप से स्टेबलकॉइन्स, की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता और वित्तीय प्रणाली पर उनके संभावित प्रभाव का भी उल्लेख किया गया है। यद्यपि यह विषय रिपोर्ट का छोटा हिस्सा है, लेकिन इसके निष्कर्ष काफी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर के वित्तीय नियामकों का ध्यान अब स्टेबलकॉइन्स की ओर बढ़ रहा है। स्टेबलकॉइन ऐसे डिजिटल टोकन होते हैं, जिनका मूल्य अमेरिकी डॉलर जैसी पारंपरिक मुद्राओं से जुड़ा होता है ताकि उनकी कीमत स्थिर बनी रहे। RBI का कहना है कि इन स्टेबलकॉइन्स को जारी करने वाली कंपनियां अब अमेरिकी सरकारी बॉन्ड जैसे सुरक्षित वित्तीय साधनों की बड़ी खरीदार बन गई हैं। दूसरे शब्दों में, ये कंपनियां अपने टोकन का मूल्य बनाए रखने के लिए बड़ी मात्रा में पारंपरिक वित्तीय परिसंपत्तियां रख रही हैं। इससे क्रिप्टो और पारंपरिक वित्तीय बाजारों के बीच संबंध पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हो गए हैं, जिस पर भारत और दुनिया भर के नियामक करीबी नजर रख रहे हैं।
रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के विश्लेषण का भी हवाला दिया गया है। इसके अनुसार, सीमापार स्टेबलकॉइन लेन-देन में तेजी से वृद्धि हुई है, विशेषकर उभरती अर्थव्यवस्थाओं में। RBI के मुताबिक, इनका उपयोग केवल क्रिप्टो ट्रेडिंग तक सीमित नहीं रह गया है। अब इनका इस्तेमाल विदेश से भेजी जाने वाली धनराशि, यानी विदेश में काम करने वाले लोगों द्वारा घर भेजा जाने वाला पैसा, और अंतरराष्ट्रीय व्यापार भुगतान में भी बढ़ रहा है। इससे संकेत मिलता है कि स्टेबलकॉइन्स धीरे-धीरे वास्तविक अर्थव्यवस्था का भी हिस्सा बनते जा रहे हैं, न केवल क्रिप्टो बाजारों का।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जिन देशों की स्थानीय मुद्रा कमजोर या अस्थिर होती है और जहां लोगों की डॉलर आधारित वित्तीय उत्पादों तक सीमित पहुंच होती है, वहां स्टेबलकॉइन्स की मांग अधिक रहती है। आसान भाषा में समझें तो, जब लोगों को अपनी स्थानीय मुद्रा का मूल्य घटने का डर होता है, तो वे अपनी बचत को सुरक्षित रखने के लिए डॉलर-समर्थित स्टेबलकॉइन्स का विकल्प चुनने लगते हैं।
RBI ने इस बढ़ती प्रवृत्ति से जुड़े एक बड़े जोखिम की ओर भी ध्यान दिलाया है, जिसे “करेंसी सब्स्टीट्यूशन” कहा जाता है। यदि लोग अपनी स्थानीय मुद्रा की बजाय डॉलर या डिजिटल डॉलर में बचत करने लगते हैं, तो इससे केंद्रीय बैंक की अर्थव्यवस्था को संचालित करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में ब्याज दरों जैसे मौद्रिक नीति के फैसलों का असर कम हो सकता है और मौद्रिक नीति को लागू करना अधिक कठिन हो जाता है।
RBI ने इसे केवल नियामकीय मुद्दा नहीं, बल्कि वित्तीय स्थिरता से जुड़ी चिंता बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि स्टेबलकॉइन्स का उपयोग बिना समय पर निगरानी के लगातार बढ़ता रहा, तो घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धन के प्रवाह का तरीका बदल सकता है, जिससे नियामकों के लिए उसकी निगरानी और नियंत्रण करना कठिन हो जाएगा।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि दुनिया के कई प्रमुख देशों ने स्टेबलकॉइन्स के लिए स्पष्ट नियामकीय ढांचे तैयार किए हैं या उन पर काम कर रहे हैं। अमेरिका ने GENIUS Act लागू किया है, यूरोपीय संघ (EU) ने मार्केट्स इन क्रिप्टो-एसेट्स (MiCA) फ्रेमवर्क लागू किया है, जबकि यूनाइटेड किंगडम (UK) भी अपना नियामकीय ढांचा विकसित कर रहा है। RBI ने इन पहलों को वैश्विक स्तर पर स्टेबलकॉइन्स के लिए स्पष्ट नियम बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।
इसके अलावा, इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन ऑफ सिक्योरिटीज कमीशन्स (IOSCO), फाइनेंशियल स्टेबिलिटी बोर्ड (FSB) और बेसल कमेटी ऑन बैंकिंग सुपरविजन (BCBS) जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी क्रिप्टो परिसंपत्तियों की निगरानी और नियमन के लिए वैश्विक मानक विकसित कर रही हैं। RBI की रिपोर्ट इन प्रयासों का उल्लेख करते हुए यह संकेत देती है कि भारत भी इसी व्यापक वैश्विक नियामकीय दृष्टिकोण का हिस्सा है।
कुल मिलाकर, RBI ने अपनी रिपोर्ट में क्रिप्टो को लेकर संतुलित और सुविचारित रुख अपनाया है। रिपोर्ट किसी तरह की घबराहट या चेतावनी नहीं देती, लेकिन यह स्पष्ट रूप से एक बढ़ती हुई चिंता को रेखांकित करती है: स्टेबलकॉइन्स अब इतने बड़े और पारंपरिक वित्तीय प्रणाली से इतने जुड़े हो चुके हैं कि उन्हें अलग-थलग मुद्दा नहीं माना जा सकता। साथ ही, यह भी संकेत मिलता है कि भारत सहित दुनिया भर के नियामक इन घटनाक्रमों पर लगातार नजर रख रहे हैं और भविष्य में अधिक स्पष्ट तथा व्यवस्थित नियामकीय ढांचे की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।