नई दिल्ली: यूनाइटेड किंगडम अपने केंद्रीय बैंक, बैंक ऑफ इंग्लैंड को एक नई जिम्मेदारी देने की तैयारी में है: डिजिटल पेमेंट्स में इनोवेशन को बढ़ावा देना, जिसमें स्टेबलकॉइन नाम की एक डिजिटल एसेट श्रेणी भी शामिल है।
स्टेबलकॉइन ऐसे डिजिटल टोकन हैं, जिन्हें बिटकॉइन जैसे वर्चुअल डिजिटल एसेट्स में होने वाले अत्यधिक उतार-चढ़ाव से बचने के लिए बनाया गया है। बिटकॉइन की कीमत एक सप्ताह में हजारों डॉलर तक बढ़ या घट सकती है, जबकि स्टेबलकॉइन को आमतौर पर अमेरिकी डॉलर या ब्रिटिश पाउंड जैसी पारंपरिक करेंसी से जोड़ा जाता है। उदाहरण के तौर पर, डॉलर से जुड़ा स्टेबलकॉइन एक डॉलर के करीब ही बना रहना चाहिए। इसी स्थिरता की वजह से स्टेबलकॉइन को रोजमर्रा के पेमेंट्स और अंतरराष्ट्रीय मनी ट्रांसफर के लिए उपयोगी माना जा रहा है।
अब तक बैंक ऑफ इंग्लैंड की पेमेंट सिस्टम से जुड़ी मुख्य जिम्मेदारी वित्तीय स्थिरता, या फाइनेंशियल स्टेबिलिटी, बनाए रखना रही है। यानी लोगों और कारोबारों के पैसे भेजने-प्राप्त करने की व्यवस्था सुरक्षित और भरोसेमंद सुरक्षित बनी रहे और किसी बड़े वित्तीय संकट का कारण न बने। अब ब्रिटेन सरकार इसमें एक दूसरा उद्देश्य जोड़ना चाहती है: जैसे-जैसे डिजिटल एसेट्स के नए रूप सामने आ रहे हैं, बैंक को पेमेंट्स में नवप्रवर्तन को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी भी मिले।अभ, वित्तीय स्थिरता मुख्या प्राथमिकता बनी रहेगी, और नवपरिवर्तन को सुरक्षा सीमाओं के भीतर काम करना होगा, न कि उन्हें हटाकर।
यह प्रस्ताव फाइनेंशियल सर्विसेज एंड मार्केट्स बिल में संशोधन के जरिए लाए जाने की उम्मीद है। इस बिल पर सितंबर 2026 में हाउस ऑफ लॉर्ड्स में चर्चा होनी है। प्रस्ताव पारित होने पर बैंक ऑफ इंग्लैंड को डिजिटल पेमेंट्स और डिजिटल मनी में इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए उठाए गए कदमों पर हर साल संसद को रिपोर्ट देनी होगी।
ब्रिटेन सरकार का यह कदम ब्रिटेन को डिजिटल फाइनेंस हब के रूप में स्थापित करने की व्यापक योजना का हिस्सा है। बैंक ऑफ इंग्लैंड पहले से यह जांचने के लिए प्रयोग कर रहा है कि स्टेबलकॉइन और ब्रिटिश पाउंड के डिजिटल संस्करण का इस्तेमाल सीमा-पार व्यापारिक पेमेंट्स में किस तरह किया जा सकता है। ब्रिटेन और अमेरिका ने एक संयुक्त बयान भी जारी किया है, जिसमें सीमा-पार वित्तीय गतिविधियों में स्टेबलकॉइन के इस्तेमाल को बढ़ावा देने और अपने रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को संरेखित करने की मंशा जताई गई है।
ब्रिटेन स्टेबलकॉइन जारी करने वाली कंपनियों के लिए विस्तृत नियम बनाने की शुरुआत कर चुका है। 2026 की शुरुआत में बैंक ऑफ इंग्लैंड ने ऐसे नियमों को अंतिम रूप दिया, जिनके तहत बड़े स्तर पर स्टेबलकॉइन जारी करने वाली कंपनियों को उनके स्टेबलकॉइन को समर्थन देने वाली कम से कम 30 फीसदी एसेट्स केंद्रीय बैंक में जमा रखनी होंगी। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि अगर बड़ी संख्या में लोग एक साथ स्टेबलकॉइन को पारंपरिक करेंसी में बदलना चाहें, तो कंपनियों के पास भुगतान के लिए पर्याप्त पैसे भंडार में मौजूद हों। हालांकि, इंडस्ट्री के कुछ लोगों ने आगाह किया है कि इससे स्टेबलकॉइन कारोबार को व्यावसायिक रूप से चलाना मुश्किल हो सकता है। बैंक ने यह निर्णय लिया है कि किसी एक स्टेबलकॉइन जारीकर्ता फिलहाल कुल 40 अरब पाउंड तक स्टेबलकॉइन प्रसारित कर सकताहै।
इसका मतलब यह नहीं है कि स्टेबलकॉइन जल्द ही लोगों की जेब में मौजूद पाउंड की जगह लेने वाले हैं। बल्कि यह इस बात का संकेत है कि ब्रिटेन सरकार डिजिटल एसेट्स को भविष्य की पेमेंट व्यवस्था का एक गंभीर हिस्सा मान रही है, न कि महज एक हाशिये का प्रयोग। सरकार चाहती है कि बैंक ऑफ इंग्लैंड इस तकनीक को विकसित करने में मदद करे, लेकिन फाइनेंशियल स्टेबिलिटी और सुरक्षा उसका केंद्रीय ध्येय बना रहे।
भारत के लिए भी ब्रिटेन का यह कदम नजर रखने लायक है। भारत में अभी स्टेबलकॉइन या अन्य वर्चुअल डिजिटल एसेट्स के लिए कोई समर्पित रेगुलेटरी फ्रेमवर्क नहीं है, हालांकि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया अपनी केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी यानी डिजिटल रुपया विकसित कर रहा है। ब्रिटेन का तरीका यह दिखाता है कि किसी संकट के आने का इंतजार किए बिना नियामक नए डिजिटल एसेट्स के साथ कैसे जुड़ सकते हैं। जैसे-जैसे ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देश अपने स्टेबलकॉइन नियमों में तालमेल बिठाने और सीमा पार पेमेंट कॉरिडोर के परीक्षण की कोशिशें आगे बढ़ा रहे हैं, भारत को भी तय करना होगा कि वह इन उभरते अंतरराष्ट्रीय मानकों को बनाने की प्रक्रिया में भूमिका निभाएगा या बाद में उनके अनुरूप अपनी व्यवस्था तैयार करेगा।