नई दिल्ली: भारत की स्पेस और मैरीटाइम क्षमता को एक साथ विकसित करने से राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री व्यापार और ब्लू इकॉनमी को नई गति मिल सकती है। MERI ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन्स में आयोजित कॉन्फ्रेंस में रक्षा विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और नीति विशेषज्ञों ने स्पेस-मैरीटाइम इंटीग्रेशन को भारत के दीर्घकालिक विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया।
स्पेस इंडस्ट्री एसोसिएशन ऑफ इंडिया के सहयोग से हुई इस चर्चा में विशेषज्ञों ने कहा कि 2047 के विकसित भारत विजन और $30 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को हासिल करने के लिए अंतरिक्ष और समुद्री क्षेत्रों में तकनीकी तालमेल जरूरी है।
सैटेलाइट निगरानी से समुद्री सुरक्षा मजबूत
विशेषज्ञों ने कहा कि सैटेलाइट इमेजिंग, समुद्री डेटा और AI के जरिए हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री गतिविधियों पर बेहतर नजर रखी जा सकती है। इससे समुद्री मार्गों की सुरक्षा और ग्रे-ज़ोन खतरों की पहचान में मदद मिलेगी।
स्वदेशी डेटा और नेविगेशन सिस्टम की जरूरत
लेफ्टिनेंट जनरल पी.जे.एस. पन्नू (रिटायर्ड) ने स्वदेशी डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की आवश्यकता बताई। GIS, PNT, ISR और AI के एकीकरण से सैटेलाइट डेटा को रणनीतिक निर्णय लेने के लिए अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है।
ब्लू इकॉनमी को मिलेगा बढ़ावा
हाइड्रोग्राफिक सर्वे, समुद्री मैपिंग और सैटेलाइट डेटा से शिपिंग, पोर्ट ऑपरेशन, समुद्री लॉजिस्टिक्स और मत्स्य क्षेत्र को फायदा मिल सकता है। SAR तकनीक समुद्र में जहाजों की निगरानी और अवैध मछली पकड़ने जैसी गतिविधियों की पहचान में भी उपयोगी है।
आपदा प्रबंधन में अहम भूमिका
चक्रवात और अन्य समुद्री आपदाओं के दौरान सैटेलाइट आधारित मौसम निगरानी और समुद्री पूर्वानुमान समय पर चेतावनी देने में मदद करते हैं। इससे तटीय इलाकों में राहत और बचाव अभियान अधिक प्रभावी बनाए जा सकते हैं।
निजी क्षेत्र की भागीदारी पर जोर
कॉन्फ्रेंस में भारतीय नौसेना, शिपिंग कंपनियों, निजी तकनीकी संस्थानों और रिसर्च संगठनों के बीच साझेदारी बढ़ाने की जरूरत बताई गई। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत PPP मॉडल भारत की स्पेस-मैरीटाइम क्षमताओं को तेजी से आगे बढ़ा सकता है।
कॉन्फ्रेंस में यह भी कहा गया कि Space-Maritime Integration भारत को सुरक्षा के साथ-साथ समुद्री व्यापार, ब्लू इकॉनमी और तकनीकी आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में मजबूत बना सकता है।