नई दिल्ली: हिंदी सिनेमा में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जिन्हें देखने के बाद दर्शक तुरंत भूल नहीं पाते। वे फिल्में सिर्फ कहानी नहीं सुनातीं, बल्कि अपने किरदारों और असहज कर देने वाले सवालों के साथ दर्शक के भीतर लंबे समय तक बनी रहती हैं। अनुराग कश्यप की फिल्म ‘Raman Raghav 2.0’ ऐसी ही फिल्मों में शामिल है।
24 जून 2016 को रिलीज हुई इस फिल्म को आज 10 साल पूरे हो गए हैं। यह एक ऐसी थ्रिलर फिल्म थी, जिसने दर्शकों को पारंपरिक हीरो-विलेन वाली दुनिया से बाहर निकालकर नैतिकता, हिंसा और इंसानी मन के अंधेरे हिस्सों से सामना कराया। फिल्म में Nawazuddin Siddiqui ने रामन्ना नाम के एक सीरियल किलर का किरदार निभाया, जबकि Vicky Kaushal एक ऐसे पुलिस अधिकारी राघवन की भूमिका में नजर आए, जो खुद भी अपनी निजी कमजोरियों और आत्म-विनाशकारी आदतों से जूझ रहा है।
रिलीज के समय फिल्म को उसके डार्क विषय, हिंसक माहौल और असामान्य कहानी कहने के तरीके के कारण अलग तरह की प्रतिक्रिया मिली थी, लेकिन समय के साथ ‘Raman Raghav 2.0’ को हिंदी सिनेमा की उन चर्चित साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्मों में गिना जाने लगा, जिनकी चर्चा आज भी फिल्म प्रेमियों के बीच होती है।
असली रामन राघव से प्रेरित, लेकिन कहानी बिल्कुल अलग
फिल्म का शीर्षक 1960 के दशक में मुंबई में सक्रिय रहे कुख्यात सीरियल किलर रामन राघव से प्रेरित है। हालांकि अनुराग कश्यप ने इसे किसी वास्तविक घटना की सीधी बायोपिक नहीं बनाया। उन्होंने उस नाम और उसके भयावह संदर्भ को आधुनिक मुंबई की कहानी में ढाल दिया।
फिल्म की कहानी वर्तमान समय के मुंबई में आगे बढ़ती है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी का किरदार रामन्ना एक ऐसा हत्यारा है जो अपने अपराधों को लेकर किसी पछतावे में नहीं दिखता। उसके लिए हत्या सिर्फ हिंसा नहीं, बल्कि उसकी अपनी विकृत सोच और पहचान का हिस्सा है।
दूसरी ओर विक्की कौशल का राघवन कानून का प्रतिनिधि है, लेकिन वह खुद पूरी तरह आदर्श नहीं है। वह नशे, गुस्से, रिश्तों की उलझनों और भीतर के अंधेरे से लड़ रहा है। यही बात फिल्म को सामान्य पुलिस बनाम अपराधी वाली कहानी से अलग बनाती है।
यहां सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पुलिस हत्यारे को पकड़ेगी या नहीं। फिल्म धीरे-धीरे यह सवाल भी उठाती है कि अच्छाई और बुराई के बीच की रेखा कितनी साफ है। क्या हर अपराधी सिर्फ अपराधी होता है? और क्या कानून का रक्षक हमेशा नैतिक रूप से सही होता है?
Nawazuddin Siddiqui की यादगार भूमिका
‘Raman Raghav 2.0’ की बात हो और नवाजुद्दीन सिद्दीकी के अभिनय का जिक्र न हो, ऐसा संभव नहीं है। रामन्ना का किरदार डरावना है, लेकिन उसकी डरावनी बात केवल उसकी हिंसा नहीं है। वह कई बार बिल्कुल सामान्य तरीके से बात करता है, मुस्कुराता है और अपने विचारों को ऐसे रखता है जैसे वह किसी साधारण बातचीत का हिस्सा हो।
यही सहजता उसके किरदार को और असहज बनाती है। नवाजुद्दीन ने इसे ऊंची आवाज, जरूरत से ज्यादा हावभाव या केवल गुस्से के सहारे नहीं निभाया। उनकी आंखों का ठहराव, बोलने का शांत तरीका और अचानक बदलते भाव दर्शक को लगातार सतर्क रखते हैं।
रामन्ना के भीतर एक अजीब तरह का विश्वास है। वह खुद को गलत नहीं मानता और राघवन के साथ अपने रिश्ते को भी अपनी ही अलग सोच से देखता है। नवाजुद्दीन ने इस जटिलता को जिस तरह निभाया, उसने इस किरदार को हिंदी सिनेमा के यादगार डार्क पात्रों में शामिल कर दिया।
विक्की कौशल का राघवन भी उतना ही जरूरी
फिल्म में नवाजुद्दीन का किरदार जितना खतरनाक है, विक्की कौशल का राघवन उतना ही भीतर से टूटता हुआ व्यक्ति है। वह एक पुलिस अधिकारी है, लेकिन उसके फैसले और उसके रिश्ते बताते हैं कि वह खुद भी संतुलित जिंदगी नहीं जी रहा।
राघवन की कहानी फिल्म का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है। वह सिर्फ रामन्ना का पीछा नहीं कर रहा, बल्कि अपने भीतर की बेचैनी से भी भाग रहा है। विक्की कौशल ने इस भूमिका में एक ऐसा तनाव दिखाया, जो संवादों से ज्यादा उनके चेहरे और शरीर की भाषा में नजर आता है।
फिल्म यह संकेत देती है कि दोनों किरदार अलग-अलग दुनिया के होने के बावजूद किसी स्तर पर एक-दूसरे के आईने की तरह हैं। एक अपनी हिंसा को खुलकर जीता है, दूसरा उसे दबाने की कोशिश करता है। इसी मनोवैज्ञानिक टकराव ने फिल्म को खास बनाया।
अनुराग कश्यप का डार्क और बेचैन मुंबई
अनुराग कश्यप की फिल्मों में शहर अक्सर सिर्फ पृष्ठभूमि नहीं होता, बल्कि कहानी का सक्रिय हिस्सा बन जाता है। ‘Raman Raghav 2.0’ में मुंबई भी ऐसा ही महसूस होता है। रात की सड़कें, संकरी गलियां, छोटे घर, पुलिस स्टेशन और शहर की अव्यवस्था फिल्म के तनाव को बढ़ाते हैं।
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी ने इस माहौल को और प्रभावशाली बनाया। कैमरा कई बार किरदारों के बेहद करीब रहता है, जिससे दर्शक को उनके साथ एक बंद और असहज जगह में होने का एहसास होता है। रोशनी और अंधेरे का इस्तेमाल भी फिल्म की मानसिक स्थिति को दिखाने में मदद करता है।
यह फिल्म मुंबई को चमकदार महानगर की तरह नहीं दिखाती। यहां शहर थका हुआ, बिखरा हुआ और कई स्तरों पर बेचैन नजर आता है। यही वातावरण रामन्ना और राघवन की दुनिया को विश्वसनीय बनाता है।

संगीत और साउंड डिजाइन ने बढ़ाया असर
फिल्म का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर भी इसकी पहचान का अहम हिस्सा है। राम संपथ का संगीत पारंपरिक बॉलीवुड शैली से अलग है। इसमें बेचैनी, अजीबपन और एक अस्थिर ऊर्जा महसूस होती है, जो कहानी के मूड से मेल खाती है।
फिल्म में संगीत का इस्तेमाल सिर्फ गानों के लिए नहीं, बल्कि तनाव पैदा करने के लिए किया गया है। कई दृश्यों में बैकग्राउंड स्कोर दर्शक को यह महसूस कराता है कि कुछ गलत होने वाला है, भले ही स्क्रीन पर उस समय कोई बड़ा घटनाक्रम न हो।
इस तरह फिल्म का संगीत कहानी के साथ चलता है और उसे और ज्यादा प्रभावी बनाता है।
10 साल बाद भी क्यों याद की जाती है फिल्म?
‘Raman Raghav 2.0’ हर दर्शक के लिए बनी फिल्म नहीं थी। इसका विषय कठिन है, हिंसा परेशान कर सकती है और इसकी दुनिया में कोई आसान जवाब नहीं मिलता। शायद यही कारण है कि फिल्म रिलीज के बाद भी लगातार चर्चा में बनी रही।
आज जब दर्शक डार्क थ्रिलर, क्राइम ड्रामा और साइकोलॉजिकल कहानियों को ज्यादा खुलकर देख रहे हैं, तब यह फिल्म पहले से ज्यादा प्रासंगिक लगती है। यह उस दौर में आई थी जब हिंदी सिनेमा में इस तरह की असहज और नैतिक रूप से धुंधली कहानियां कम देखने को मिलती थीं।
फिल्म की आठ अध्यायों वाली संरचना, असामान्य संवाद, डार्क ह्यूमर और किरदारों की मनोवैज्ञानिक परतें इसे बार-बार देखने लायक बनाती हैं। कई दर्शक आज भी इसके अंत और रामन्ना-राघवन के रिश्ते को अलग-अलग तरीके से समझते हैं।

कान्स तक पहुंची थी फिल्म
‘Raman Raghav 2.0’ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली थी। फिल्म का प्रीमियर 2016 के कान्स फिल्म फेस्टिवल के डायरेक्टर्स फोर्टनाइट सेक्शन में हुआ था। इसके बाद इसे कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भी दिखाया गया।
यह उपलब्धि फिल्म के लिए महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इससे भारतीय थ्रिलर सिनेमा की एक अलग शैली को वैश्विक मंच पर पहुंचने का मौका मिला। फिल्म ने यह दिखाया कि भारतीय कहानियां केवल बड़े सितारों और पारंपरिक मनोरंजन तक सीमित नहीं हैं। वे असहज, प्रयोगधर्मी और मनोवैज्ञानिक रूप से जटिल भी हो सकती हैं।
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10 साल बाद ‘Raman Raghav 2.0’ को याद करना सिर्फ एक फिल्म की वर्षगांठ मनाना नहीं है। यह उस फिल्म को दोबारा देखने जैसा है जिसने दर्शकों को सहज महसूस कराने की कोशिश नहीं की। उसने सवाल छोड़े और इंसानी मन की उन परतों को छुआ जिनके बारे में बात करना आसान नहीं होता।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी का रामन्ना, विक्की कौशल का राघवन और अनुराग कश्यप का बेचैन मुंबई आज भी उतना ही प्रभाव छोड़ता है। यही वजह है कि ‘Raman Raghav 2.0’ 10 साल बाद भी सिर्फ एक क्राइम थ्रिलर नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा की एक महत्वपूर्ण डार्क फिल्म के रूप में याद की जाती है।