11 मार्च, 2026, दिल्ली :
संयुक्त राज्य अमेरिका के ट्रेज़री सेक्रेटरी द्वारा पिछले महीने वर्ष 2026 के G20 फाइनेंस ट्रैक का एजेंडा जारी किया गया, जिसमें “वर्चुअल डिजिटल एसेट (VDA) इकोसिस्टम को मजबूत करना” प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल किया गया है। इसका अर्थ है कि G20 देशों के वित्त मंत्री तथा केंद्रीय बैंक गवर्नर वैश्विक स्तर पर वर्चुअल डिजिटल एसेट इकोसिस्टम को सुदृढ़ बनाने के उपायों पर विचार-विमर्श करेंगे। यह चर्चा वित्तीय विनियमन को आधुनिक बनाने, ऋण संबंधी पारदर्शिता बढ़ाने तथा सीमा-पार भुगतान प्रणालियों में सुधार जैसे विषयों के साथ की जाएगी।
G20 फाइनेंस ट्रैक के एजेंडे में VDAs को प्रमुख विषय के रूप में शामिल किया जाना इस बात को दर्शाता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन डिजिटल एसेट्स को भविष्य की वैश्विक वित्तीय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है। अब तक G20 फाइनेंस ट्रैक का मुख्य ध्यान व्यापक आर्थिक स्थिरता, कराधान व्यवस्था तथा वित्तीय क्षेत्र की मजबूती जैसे मुद्दों पर रहा है। हालांकि अब डिजिटल एसेट्स को वित्तीय नवाचार के महत्वपूर्ण साधन के रूप में देखा जा रहा है। इसी कारण वास्तविक परिसंपत्तियों के टोकनाइज़ेशन, स्टेबलकॉइन, ब्लॉकचेन आधारित अवसंरचना तथा विकेंद्रीकृत वित्त (DeFi) जैसे विषय आगामी बैठकों में चर्चा के प्रमुख बिंदु बन सकते हैं।
G20 पहले भी क्रिप्टो-एसेट्स से संबंधित अंतरराष्ट्रीय नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुका है। वर्ष 2023 में भारत की G20 अध्यक्षता के दौरान फाइनेंशियल स्टेबिलिटी बोर्ड (FSB) और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा संयुक्त रूप से G20 क्रिप्टो-एसेट पॉलिसी इम्प्लीमेंटेशन रोडमैप तैयार किया गया था। इस रोडमैप में क्रिप्टो-एसेट्स की नवाचार क्षमता को स्वीकार करते हुए उनसे जुड़े संभावित वित्तीय जोखिमों को ध्यान में रखते हुए एक आधारभूत नियामकीय एवं निगरानी ढांचे की रूपरेखा प्रस्तुत की गई थी।
पिछले दो वर्षों में कई देशों ने इसी रोडमैप को ध्यान में रखते हुए डिजिटल एसेट्स से संबंधित अपनी राष्ट्रीय नीतियां विकसित की हैं। वर्ष 2026 के एजेंडे में VDAs को विशेष रूप से शामिल करके अमेरिका यह संकेत देता दिखाई देता है कि वह वैश्विक स्तर पर नियामकीय समन्वय को और अधिक मजबूत करना चाहता है। इससे विभिन्न देशों के बीच नियामकीय अंतर कम करने तथा सीमा-पार सहयोग को बढ़ावा देने में सहायता मिल सकती है। साथ ही, उपभोक्ता संरक्षण, बाजार की पारदर्शिता, मनी लॉन्ड्रिंग तथा आतंकवाद के वित्तपोषण की रोकथाम (AML/CFT) और वित्तीय स्थिरता जैसे विषयों पर साझा मानकों की दिशा में भी प्रगति संभव है। उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए इस प्रकार की समन्वित चर्चा नियामकीय अंतर को कम करने तथा नियामकीय अवसरवाद के जोखिम को घटाने में सहायक हो सकती है।
वैश्विक स्तर पर वी.डी.ए. पर चर्चा को बढ़ावा देने की अमेरिकी पहल उसके घरेलू नियामकीय ढांचे में हो रहे बदलावों से भी जुड़ी हुई है। राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका ने गाइडिंग एंड एस्टैब्लिशिंग नेशनल इनोवेशन फॉर यू.एस. स्टेबलकॉइन्स (जीनियस) एक्ट लागू किया है, जो स्टेबलकॉइन के लिए एक औपचारिक नियामकीय ढांचा प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त डिजिटल एसेट मार्केट क्लैरिटी एक्ट, जिस पर वर्तमान में अमेरिकी सीनेट में विचार किया जा रहा है, विभिन्न प्रकार के डिजिटल एसेट्स के लिए सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (एस.ई.सी.) तथा कमोडिटी फ्यूचर्स ट्रेडिंग कमीशन (सी.एफ.टी.सी.) की नियामकीय जिम्मेदारियों को स्पष्ट करने का प्रयास करता है।
भारत के लिए यह घटनाक्रम अवसर और चुनौतियां दोनों प्रस्तुत करता है। भारतीय रिजर्व बैंक ने कई अवसरों पर वर्चुअल डिजिटल एसेट्स, विशेषकर स्टेबलकॉइन, से जुड़े संभावित जोखिमों को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की है। वहीं दूसरी ओर भारत सरकार ने वैश्विक स्तर पर हो रहे नियामकीय विकासों का अध्ययन करते हुए अब तक संतुलित और सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया है। नीति निर्माताओं ने वित्तीय नवाचार को बढ़ावा देने के साथ-साथ वित्तीय स्थिरता को बनाए रखने और संभावित जोखिमों के प्रबंधन के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया है।
G20 फाइनेंस ट्रैक में VDAs पर बढ़ता ध्यान भारत को वैश्विक चर्चाओं में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर भी प्रदान करता है। भारत वित्तीय समावेशन, उपभोक्ता संरक्षण, डिजिटल अवसंरचना की इंटरऑपरेबिलिटी तथा व्यापक आर्थिक स्थिरता जैसे विषयों पर अपने अनुभव और दृष्टिकोण साझा कर सकता है। इसके साथ ही यह मंच भारत को यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) तथा अन्य डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी घरेलू पहलों की सफलता को प्रस्तुत करने का अवसर भी देता है, जिनकी मदद से देश में व्यापक रूप से उपयोग किया जाने वाला डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम विकसित हुआ है।
ऐसी स्थिति में भारत को आगामी G20 चर्चाओं में सक्रिय भागीदारी करनी चाहिए और ऐसे वैश्विक मानकों के विकास का समर्थन करना चाहिए जो उसकी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप हों। तेजी से विकसित हो रहे फिनटेक क्षेत्र को देखते हुए भारत के लिए यह महत्वपूर्ण है कि उभरते VDA ढांचे अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से विकसित हों। VDA जारी करने की व्यवस्था, AML/CFT सुरक्षा उपायों तथा सीमा-पार भुगतान और निपटान प्रणालियों जैसे विषयों पर चर्चा भारत को वैश्विक मानकों के साथ तालमेल स्थापित करने में सहायता करेगी और साथ ही घरेलू स्तर पर जिम्मेदार नवाचार को भी बढ़ावा देगी।
जैसे-जैसे वर्चुअल डिजिटल एसेट्स वित्तीय बाजारों और सेवाओं को नया स्वरूप दे रहे हैं, वैश्विक VDA मानकों के निर्माण में भारत की सक्रिय भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। इससे न केवल देश में एक प्रभावी नियामकीय ढांचा विकसित करने में सहायता मिलेगी, बल्कि वैश्विक वित्तीय शासन की भविष्य दिशा को प्रभावित करने में भी भारत की भूमिका मजबूत होगी।